मेरे प्रिय विद्यार्थी, कैसे हो तुम? इन औपचारिक शब्दों के साथ तुम्हें पत्र लिखने का साहस कर रहा हूँ। वह भी इसलिए कि साल में एक बार मुझे सम्मानित करने का दुस्साहस करते हुए तुम भी एक औपचारिकता निभा ही लेते हो। हम दोनों एक-दूसरे की पहचान है। हमारा एक-दूसरे के बिना कोई अस्तित्व ही नहीं है। मैं इस बात को अच्छी तरह से जानता हूँ, इसलिए मेरे पूरी कोशिश रहती है कि मैं अपने ज्ञान का एक-एक सुनहरा मोती तुम पर न्योछावर कर दूँ। जिसे स्वीकार कर तुम जगमगा उठो। अपने इस कार्य में मैं पूरी ईमानदारी से जुटा हुआ हूँ। तुम्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाने का दायित्व मुझ पर है। बड़े होकर तुम डॉक्टर,इंजीनियर, कलेक्टर, उद्योगपति या कुछ और भी बनो लेकिन समाज के एक सभ्य नागरिक बनो, इसी कोशिश में मैं तुम्हें ज्ञान के साथ-साथ अच्छे संस्कार भी देता हूँ। न केवल आज, बल्कि सदियों से संस्कारों का उपहार तुम्हें देता चला आ रहा हूँ। मगर आज इन संस्कारों की कोई कीमत नहीं रह गई है और इनके साथ-साथ मेरा मूल्य भी घटता जा रहा है। आज इस बात को महसूस कर रहा हूँ। तभी अपनी व्यथा इस पत्र के माध्यम से तुम तक पहुँचाने का साहस भी कर पा रह...
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